"इस मशीनी दौर में रफ़्तार   ही पहचान है
  धीरे  धीरे जो  चलेंगे  गुमशुदा हों  जाएँगे"

"ये सारी  सरहदें  बन  जाएँगी  पुल देखना एक दिन
  पुकारेगी    कभी  इंसान    को  इंसान  की  चाहत"

"इन आसुओं से लहजे को सींचा करो 'मिज़ाज'
  जिंदा    वही  है  पेड़  जो  पानी   के   पास है"

"मैं  समन्दरों  का  मिज़ाज  हूँ  अभी  उस  नदी  को पता नहीं     
 सभी मुझसे आ के लिपट गयीं मैं किसी से जा के मिला नहीं "

"चाहत पहन के बारिशों में घूमता हूँ मैं
  ये वो लिबास है जो कभी भीगता नहीं"

"मंज़िलें  ख्वाब  बन  के  रह  जाएँ   
  इतना बिस्तर से प्यार क्या करना"

"उजाला करने को दीपक जला लिया दिल में    
  अब इसकी आँच भी सहने का होंसला रखना "

"चमकती है कहीं सदियों में आसुओं से ज़मीं
  ग़ज़ल  के  शेर  कहाँ  रोज़  रोज़   होते  हैं"

हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के अदबी रिसालों में हज़ारों शायर छप रहे हैं लेकिन ग़ज़ल इतनी आसान नहीं है जितनी की नज़र आती है यही वजह है की हिन्दुस्तान और पाकिस्तान में चंद शायर ऐसे हैं जो ग़ज़ल के बदलते हुए मिज़ाज का साथ देने में कामयाब हैं | पिछले दस सालों में जो शायर उभरे हैं उनमें ’अशोक मिज़ाज’ सरे फ़हरिस्त हैं |
- बशीर ‘बद्र’     


अशोक मिज़ाज इस ख़राबे में इंसानियत और मुहब्बत का पैग़ाम लेकर आये हैं | भाईचारे और यकजहती को अपनी शायरी के ज़रिये आम करना चाहते हैं | इंसानी हमदर्दी और इंसानी बराबरी इनका ख्वाब है | अशोक अपनी फिक्र की सदकतों के सबब मौजूद हालत में न सिर्फ कौमी बल्कि आलमी सतह पर ये साबित करने में कामयाब हैं कि यही आवाज़ आलमी भाईचारे को ज़िंदा रखने को जरूरी है |
- राहत इंदौरी



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